भविष्य में, बादलों के आवरण में कमी के साथ-साथ बादलों की जल-सामग्री में वृद्धि हो सकती है, जो बादलों के प्रकार में अधिक संवहनीय (कन्वेक्टिव) बादलों की ओर बदलाव का संकेत देती है, जिसके परिणामस्वरूप चरम वर्षा हो सकती है। इसका अर्थ है कि भारतीय ग्रीष्म मानसून मौसम में संवहनीय वर्षा के संक्षिप्त प्रकोप देखने को मिल सकते हैं, जो चरम वर्षा घटनाओं को जन्म देंगे, किंतु अधिकांश दिनों में शुष्क परिस्थितियां बनी रहेंगी। डॉ. स्टेला जेस वर्गीस, जो वर्तमान में CEOAS में विज्ञान एवं इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (SERB) राष्ट्रीय पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो के रूप में कार्यरत हैं, ने अशोक करूमुरी के मार्गदर्शन में यह शोध किया। यह सीएसआईआर फोर्थ पैराडाइम इंस्टीट्यूट (अब सीएसआईआर-एनआईडीएसए), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे, एवं मौसम विज्ञान अनुसंधान संस्थान (MRI), जापान के वैज्ञानिकों को समाहित करने वाला एक सहयोगी शोध भी है, जिसमें साजनी सुरेंद्रन, कविराजन राजेंद्रन, सुबिमल घोष एवं अकियो कितोह शामिल हैं।
यह अध्ययन जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुआ https://agupubs.onlinelibrary.wiley.com/doi/10.1029/2023GL105680