वर्ष 2022 के दौरान भारतीय हिमालयी क्षेत्र में क्लाउडबर्स्ट (बादल फटने) की गतिशीलता का स्थानीयकृत विश्लेषण
द्वारा कृष्ण चंद्र गौड़ा, पी. सामंतराय
इस शोध में, मुख्य ध्यान भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) में स्थानीयकृत क्लाउडबर्स्ट (बादल फटने) की घटनाओं की जांच करने पर केंद्रित है। विशेष रूप से, वर्ष 2022 में इस क्षेत्र में बादल फटने के कुल 66 मामले देखे गए, जो हाल के दिनों में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं (ERE) की गंभीरता में वृद्धि का संकेत देते हैं। सीमित जानकारी और जागरूकता के कारण, पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाले ये खतरे अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। भौगोलिक विशेषताओं में व्यापक भिन्नता और क्षेत्रीय अंतर के कारण, अत्यधिक वर्षा की घटनाओं (EREs) की तीव्रता, अवधि और आवृत्ति में भी भिन्नता पाई जाती है। इसलिए, शोधकर्ताओं की समझ को बेहतर बनाने और भविष्य में अत्यधिक तीव्र स्थानीयकृत घटनाओं के सिमुलेशन (अनुकरण) को सुगम बनाने के लिए इन घटनाओं के दौरान वायुमंडल की गतिशीलता (डायनामिक्स) का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अत्यधिक वर्षा की घटनाओं (ERE) की गतिशीलता के व्यवस्थित विश्लेषण के लिए इस शोध में भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) को देशांतर के अनुसार बॉक्स (\(1^\circ \times 1^\circ\)) में वर्गीकृत किया गया था। इसके अलावा, हमारा अध्ययन बादल फटने की घटनाओं के दौरान विभिन्न बॉक्सों में दर्ज की गई वर्षा के संबंध में वायुमंडलीय गतिशीलता के सांख्यिकीय अवलोकनात्मक विश्लेषण पर जोर देता है। संबंधित क्षेत्र में घटना से 2 दिन पहले की अवधि के वायुमंडलीय अध्ययनों को ध्यान में रखते हुए समय-आधारित (टेंपोरल) विश्लेषण किया गया है। विभिन्न बॉक्सों में प्रमुख भौतिक और ताप-गतिज (थर्मोडायनामिक) वायुमंडलीय मापदंडों और वर्षा के बीच के संबंधों को समझा और विश्लेषित किया गया है। भविष्य के बारे में सटीक पूर्वानुमान लगाने के लिए वायुमंडल और भूमि की सतह के बीच के जटिल संबंधों को समझना बेहद जरूरी है। इन जटिल अंतःक्रियाओं का गहराई से अध्ययन करके, शोधकर्ता मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं जो पूर्वानुमान मॉडलों को बेहतर बनाने और पृथ्वी की प्रणालियों के बारे में हमारी समझ को बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।
बदलती जलवायु परिस्थितियों के अंतर्गत वर्षा पूर्वानुमान एवं फसल उपज भविष्यवाणी का अध्ययन: शोध अंतरालों एवं उन्नत समाधानों की समीक्षा
द्वारा दिव्याश्री एच.एस., आर. गिरीशा एवं कृष्ण चंद्र गौड़ा
चूंकि वर्षा पूर्वानुमान का फसल उपज, संसाधन प्रबंधन, तथा समग्र कृषि उत्पादकता पर सीधा प्रभाव पड़ता है, अतः यह कृषि योजना हेतु अत्यंत आवश्यक है। वर्षा प्रतिरूप कई आंतरिक एवं बाह्य कारकों से प्रभावित होते हैं, जैसे तापमान, आर्द्रता, वायुमंडलीय दाब में परिवर्तन, तथा मानसून परिवर्तनशीलता। सिंचाई कार्यक्रमों को अधिकतम करने, मृदा नमी को संरक्षित करने, तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को सुनिश्चित करने हेतु वर्षा पूर्वानुमान की सटीकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। अप्रत्याशित वर्षा प्रतिरूप फसल विफलता, संसाधनों के अकुशल उपयोग, तथा किसानों हेतु वित्तीय हानि का कारण बनते हैं। विगत मौसम डेटा एवं जलवायु मानकों का उपयोग करते हुए, यह समीक्षा वर्षा पूर्वानुमानों की सटीकता बढ़ाने हेतु अत्याधुनिक मशीन लर्निंग एवं डीप लर्निंग मॉडलों को समेकित करती है। ये मॉडल ऐतिहासिक मौसम प्रतिरूपों एवं पर्यावरणीय चरों का विश्लेषण कर पूर्वानुमान की सटीकता को बढ़ाते हैं, जिससे गंभीर मौसमी घटनाओं हेतु तत्परता में वृद्धि होती है। किसानों, नीति-निर्माताओं, तथा कृषि शोधकर्ताओं को जलवायु-संबंधी जोखिमों को कम करने हेतु डेटा-संचालित रणनीतियां विकसित करने के लिए, सटीक वर्षा पूर्वानुमान महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। कर्नाटक की प्रमुख फसलों को एक केस अध्ययन के रूप में उपयोग करते हुए, यह अध्ययन पूर्वानुमानित वर्षा डेटा के आधार पर फसल उपज का आकलन कर इसे और विस्तारित करता है। सटीक उपज पूर्वानुमान खाद्य सुरक्षा एवं आर्थिक स्थिरता दोनों हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तनों का कृषि उत्पादकता पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। कृषि उत्पादन के पूर्वानुमान में DL मॉडलों की प्रभावशीलता का विश्लेषण, 2020 से 2025 के बीच प्रकाशित साहित्य एवं पूर्वानुमान विश्लेषणों की समीक्षा के माध्यम से किया गया है, जिसमें नए अनुभवजन्य वर्षा अथवा कृषि उपज आकलन प्रदान करने के बजाय पद्धतियों, परिणामों, एवं शोध अंतरालों के रुझानों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह समीक्षा जलवायु मॉडलिंग एवं कृषि विश्लेषण में हुई प्रगति का लाभ उठाकर खाद्य सुरक्षा में सुधार, संसाधन उपयोग को अनुकूलित करने, तथा सूचित निर्णय लेने में सहायक होती है। परिणाम, बदलते पर्यावरण के समक्ष टिकाऊ फसल उपज सुनिश्चित करते हुए, लचीली कृषि पद्धतियों हेतु एक व्यापक ढांचा प्रदान करते हैं।
23 अप्रैल 2023 के भूचुंबकीय तूफान के दौरान EIA शिखरों की तीव्रता में गोलार्ध असममिति का तीव्र प्रत्यावर्तन: GOLD से एक अद्वितीय प्रेक्षण
द्वारा के. शिम्ना, आर. के. अर्चना, सी. विनीत, गैंग लू, टी. के. पंत एवं एम. एस. एम. विजयन
यह अध्ययन, ग्लोबल-स्केल ऑब्ज़र्वेशन्स ऑफ द लिम्ब एंड डिस्क (GOLD) के प्रतिवेदनों से प्राप्त आयनमंडलीय F-क्षेत्र के शिखर इलेक्ट्रॉन घनत्व का उपयोग करते हुए, पहली बार एक अद्वितीय परिघटना को प्रस्तुत करता है: 23 अप्रैल 2023 के भूचुंबकीय तूफान के मुख्य चरण के दौरान गोलार्धों के मध्य भूमध्यरेखीय आयनीकरण विसंगति (EIA) शिखरों की तीव्रता का तीव्र प्रत्यावर्तन। तात्कालिक भेदन विद्युत क्षेत्र (Prompt Penetration Electric Field) ने दोनों EIA शिखरों की तीव्रता को बढ़ाया। हालांकि, दक्षिणी शिखर पर हुई वृद्धि एक घंटे के भीतर क्षीण होने लगी, जबकि उत्तरी शिखर सुदृढ़ होने लगा। थर्मोस्फीयर-आयनोस्फीयर-इलेक्ट्रोडायनामिक्स जनरल सर्कुलेशन मॉडल (TIE-GCM) के अनुकरणों से संकेत मिलता है कि इन विविधताओं में ट्रांस-इक्वेटोरियल पवन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भू-आधारित कुल इलेक्ट्रॉन कंटेंट (TEC) मापनों के वेवलेट पीरियडोग्राम ने ट्रैवलिंग आयनोस्फेरिक डिस्टर्बेंसेज़ (TIDs) की उपस्थिति की पुष्टि की। तूफान-प्रेरित पवनों एवं TIDs ने संभवतः F-शिखरों की ऊंचाई तथा शिखरों के मध्य पुनर्संयोजन दरों को परिवर्तित किया, तथा ट्रांस-इक्वेटोरियल पवनों द्वारा प्लाज़्मा परिवहन ने भी इस दुर्लभ परिघटना में योगदान दिया।
जून 2025 के भूचुंबकीय तूफान के दौरान भारतीय क्षेत्र में ग्रीष्म संक्रांति आयनमंडल की विशिष्ट तूफान-कालिक गतिकी
द्वारा प्राजक्ता चौगुले, सुगुमार ईश्वरिया, शिव साई कुमार राजना, ददासो शेट्टी, सुस्मिता चौगुले, चिरंजीवी जी. विवेक, जे. आर. के. कुमार दब्बाकुटी, अजीत के. मौर्या, सुदीप्ता सासमल, एवं संपद कुमार पांडा
यह अध्ययन 1 से 3 जून 2025 के तीव्र भूचुंबकीय तूफान के दौरान भारतीय देशांतर क्षेत्र में आयनमंडल की कालिक एवं अक्षांशीय परिवर्तनशीलता की जांच करता है, जिसके लिए GNSS रिसीवर प्रेक्षणों एवं मैग्नेटोमीटर रिकॉर्डिंग्स के साथ-साथ इन-सीटू Swarm उपग्रह, COSMIC-2 रेडियो ऑकल्टेशन, GUVI/TIMED-व्युत्पन्न O/N2 अनुपातों, तथा मॉडल-व्युत्पन्न विद्युत क्षेत्रों से प्राप्त अंतरिक्ष-आधारित मापनों का उपयोग किया गया है। यह विशेष घटना अपेक्षाकृत नई है तथा एक संक्षिप्त पुनर्प्राप्ति चरण से पृथक दो विशिष्ट मुख्य चरणों वाली द्विभाजित विविधता द्वारा चिह्नित है। परिणामों ने भूचुंबकीय तूफान से संबद्ध विशिष्ट विशेषताओं को उजागर किया, जिनमें धनात्मक एवं ऋणात्मक आयनमंडलीय चरण, थर्मोस्फेरिक संघटनात्मक परिवर्तन, तथा विक्षोभों का अक्षांशीय प्रसार शामिल हैं। 1 जून को, प्रेक्षित प्रबल धनात्मक आयनमंडलीय तूफान तात्कालिक भेदन विद्युत क्षेत्रों (PPEFs) एवं भूमध्यरेखा-दिशोन्मुख उदासीन पवनों द्वारा संचालित था, जिसने प्रबलित भूमध्यरेखीय फाउंटेन प्रभाव के माध्यम से F-क्षेत्र प्लाज़्मा को उच्चतर ऊंचाइयों तक उठाया, जिससे दिन से रात्रि तक असामान्य रूप से दीर्घकालिक कुल इलेक्ट्रॉन कंटेंट (TEC) वृद्धि हुई। विश्लेषण ने विशिष्ट अक्षांशीय व्यवहार को भी उजागर किया, जिसमें भूमध्यरेखीय आयनीकरण विसंगति (EIA) शिखर का स्पष्ट ध्रुव-दिशोन्मुख विस्तार तथा कुशल प्लाज़्मा पुनर्वितरण के माध्यम से भूमध्यरेखीय स्थान की तुलना में निम्न से मध्य अक्षांशों तक महत्वपूर्ण TEC वृद्धि (शांत दिवस मानों का ~150–200%) प्रदर्शित हुई। इसके विपरीत, 2 जून को लगभग सभी अक्षांशीय स्थानों पर स्पष्ट ऋणात्मक आयनमंडलीय तूफान प्रभाव, जटिल एवं असामान्य तूफान-कालिक गतिकी की पुष्टि करता है, जिसमें विक्षोभ डायनेमो विद्युत क्षेत्रों (DDEFs) की उपस्थिति के कारण ऊर्ध्वगामी प्लाज़्मा प्रवाह अवरुद्ध रहे, जबकि थर्मोस्फेरिक O/N2 अनुपात ने भारतीय क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन घनत्व में व्यापक कमी उत्पन्न की। 3 जून को देखा गया मामूली ऋणात्मक तूफान, तूफान पुनर्प्राप्ति अवधि के साथ मेल खाता है, जो दीर्घकालिक विक्षोभ डायनेमो प्रभावों तथा थर्मोस्फेरिक परिस्थितियों में क्रमिक पुनर्प्राप्ति को दर्शाता है। कुल मिलाकर, वर्तमान अध्ययन जून 2025 के भूचुंबकीय तूफान के दौरान प्रचलित युग्मित इलेक्ट्रोडायनामिक-थर्मोस्फेरिक बल के प्रति क्षेत्रीय आयनमंडल की प्रबल संवेदनशीलता को उजागर करता है, जो भारतीय देशांतर क्षेत्र हेतु इस घटना के लिए अभी तक रिपोर्ट नहीं की गई है। इसके अतिरिक्त, इस अध्ययन के निष्कर्ष भारतीय देशांतर क्षेत्र में ग्रीष्म संक्रांति आयनमंडल के विशिष्ट तूफान-कालिक व्यवहार को रेखांकित करते हैं, जो जटिल युग्मित प्रक्रियाओं द्वारा संचालित है, जिन्हें आयनमंडलीय मॉडलों एवं पूर्वानुमान ढांचों में समाहित किया जा सकता है।
स्रोत: https://doi.org/10.3390/atmos17020189
Mw 7.6 केमैन द्वीप भूकंप (8 फरवरी 2025) द्वारा प्रेरित सह-भूकंपीय आयनमंडलीय विक्षोभों के GNSS-व्युत्पन्न TEC हस्ताक्षर
द्वारा संबित प्रसनजीत नाइक, शिव साई कुमार राजना, संपद कुमार पांडा, चिरंजीवी जी. विवेक एवं देवांशु घिल्डियाल
यह अध्ययन GNSS-आधारित कुल इलेक्ट्रॉन कंटेंट (TEC) प्रेक्षणों का उपयोग करते हुए, 8 फरवरी 2025 को कैरिबियन सागर में ट्रांसफॉर्म भ्रंश (फॉल्ट) संरचना के अनुदिश Mw 7.6 केमैन द्वीप भूकंप द्वारा प्रेरित सह-भूकंपीय आयनमंडलीय विक्षोभों (CIDs) की जांच करता है। आयनमंडलीय विक्षोभों की जांच के माध्यम से इस विशिष्ट भूकंप घटना के प्रभावों का लक्षण वर्णन करने का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह घटना शांत सौर एवं भू-चुंबकीय परिस्थितियों में घटित हुई। इससे नीचे से स्थलमंडलीय बल द्वारा उत्पन्न आयनमंडलीय विक्षोभों की स्पष्ट पहचान होती है, तथा ठोस पृथ्वी-आयनमंडल युग्मन तंत्रों के संबंध में मूल्यवान जानकारी प्राप्त होती है। इस भूकंप में दो-चरणीय विदर (रप्चर) प्रक्रिया देखी गई, जो एक धीमे प्रारंभिक उप-शियर विदर चरण से आरंभ होकर तीव्र गति से सुपरशियर व्यवस्था में परिवर्तित हुई। इस विदर व्यवहार ने प्रबल भू-गति उत्पन्न करने में सहायता की तथा वायुमंडलीय ध्वनिक-गुरुत्व तरंगें (AGWs) उत्पन्न कीं, जो ऊर्ध्वगामी रूप से प्रसारित होकर आयनमंडलीय ऊंचाई तक पहुंचीं। उल्लेखनीय रूप से, फिल्टर किए गए TEC डेटा ने भूकंप के पश्चात विशिष्ट दोलन (ऑसिलेशन) प्रदर्शित किए, जिसने CIDs के हस्ताक्षरों को स्पष्ट रूप से दर्शाया, जिनका आयाम 0.8 TECU तक पहुंचा। फिल्टर किए गए TEC मानों ने वायुमंडलीय प्रभावों एवं परिवेशी भू-चुंबकीय क्षेत्र के कारण स्थानिक असममिति भी प्रदर्शित की। साथ ही, स्पेक्ट्रल विश्लेषण ने प्रमुख ध्वनिक तरंग आवृत्तियों (2–4 mHz) तथा क्षैतिज प्रसार वेगों (~1.34 किमी/सेकंड) की पुष्टि की, जो सैद्धांतिक ध्वनिक तरंग गतियों के अनुरूप हैं, जिससे भूकंपीय उत्पत्ति वाले आयनमंडलीय विक्षोभों के हस्ताक्षरों की और पुष्टि हुई। ये निष्कर्ष ट्रांसफॉर्म प्लेट सीमा संरचनाओं में भूकंपीय गतिविधि के विश्वसनीय संकेतकों के रूप में CIDs की भूमिका को सुदृढ़ करते हैं, तथा वास्तविक-समय भूकंप निगरानी हेतु GNSS नेटवर्क के संभावित उपयोग को रेखांकित करते हैं।
स्रोत: https://doi.org/10.1007/s12145-026-02134-6
- क्लाउड सीडिंग के माध्यम से कृत्रिम वर्षा: प्रक्रियाओं एवं सिद्धांतों का एक अवलोकन
- 23 अप्रैल 2023 के भूचुंबकीय तूफान के दौरान EIA शिखरों की तीव्रता में गोलार्ध असममिति का तीव्र प्रत्यावर्तन: GOLD से एक अद्वितीय प्रेक्षण
- मई 2015 के दौरान ओडिशा में चरम तापमान घटनाओं के अनुकरण पर भूमि उपयोग परिवर्तन के प्रभाव का आकलन
- सन-स्काई रेडियोमीटर (POM-01) से 940 एनएम अवशोषण बैंड पर वर्षणीय जल वाष्प की पुनर्प्राप्ति: कैलिब्रेशन, मापन एवं सत्यापन
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